सूफी काव्य संबंधी प्रमुख तथ्य

सूफी काव्य संबंधी प्रमुख तथ्य या प्रेमाश्रयी काव्यधारा के महत्त्वपूर्ण तथ्य का अध्ययन इस पोस्ट में करेंगे | इसमें प्रेम काव्य के प्रमुख तथ्यों को दिया गया है |  

 सूफी काव्य की पहली रचना 

→ हंसावली (1370 ई.)-असाइत : गणपतिचंद्र गुप्त
→ चंदायन (1379 ई.) –मुल्ला दाऊद : रामकुमार वर्मा
→ सत्यवती कथा (1501 ई.) –ईश्वरदास : हजारीप्रसाद द्विवेदी
→ मृगावती (1501 ई.) –कुतुबन : रामचंद्र शुक्ल

सूफी काव्य की मुख्य बातें 

सूफी साहित्य की रचना सिंध और पंजाब प्रांत से आरंभ हुई। 

रामचंद्र शुक्ल ने कुतुबन कृत मृगावती (1501) को सूफी काव्य की प्रथम रचना माना है और इंद्रावती (नूरमुहम्मद कृत, 1744 ई.) रचना को सूफी आख्यान परंपरा की समाप्ति कहा है।

रामचंद्र शुक्ल ने सूफी या प्रेममार्गी शाखा का एकमात्र हिंदू कवि सूरदास नामक एक पंजाबी को माना है, जिसकी रचना ‘नल दमयन्ती’ है।

सूफी कवियों ने संत कवियों के ठीक विपरीत परमात्मा को स्त्री और आत्मा को पुरुष माना है।

सूफी कवियों में एकमात्र स्त्री राबिया हुईं। ये बसरा की रहने वाली थीं।

सूफी काव्य में 5 चौपाइयों के बाद एक दोहा देने की परंपरा निम्न सूफी काव्यों में मिलती हैं 1. चंदायन (1379), 2. सत्यवती कथा ( 1501), 3. मृगावती (1501), 4. मधुमालती (1545), 5. आलम कृत माधवानल कामकंदला (1584), 6. इंद्रावती (1744 ई.)

सूफीकाव्य में 7 चौपाइयों के बाद दोहा देने की परम्परा निम्न रचनाओं में मिलती हैं- 1. पद्मावत (1540), 2. चित्रावली (1613 ई.)

इस्लामी रहस्यवादी आंदोलन सूफी आंदोलन था। भारत में चिश्ती-संप्रदाय को सर्वाधिक प्रसिद्धि मिली थी। सूफी संत ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती (दरगाह अजमेर) पृथ्वीराज चौहान के समय भारत आये थे चिश्ती-संप्रदाय का केंद्र अजमेर था।

मुइनुद्दीन चिश्ती ने संगीत को ईश्वर के निकट पहुँचने का मार्ग बताया था।

⇒’खानकाह’ सूफी आश्रम को कहा जाता था आध्यात्मिक प्रवर्त्तक पीर कहे जाते थे। सूफी संत शेख अहमद सरहिंदी को जहाँगीर ने बंदी बनाया था।

शेख सलीम चिश्मी को ‘शेख उल हिंद’ की उपाधि तथा शेख बहादुद्दीन जकारिया को इल्तुतमिश ने ‘शेख उल इस्लाम’ की उपाधि दी थी।

निजामुद्दीन औलिया नामक सूफी संत ने सुल्तान फिरोज खिलजी से मिलने के लिए मना कर दिया था।

सूफी संप्रदाय का प्रवेश भारत में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती (12वीं सदी) के समय से माना जाता है। सूफियों के 4 संप्रदाय थे- चिश्ती (12वीं सदी), सोहरावर्दी (12वीं सदी), कादरी (15वीं सदी), नक्शबंदी (15वीं सदी)।

मधुमालती की कथा के आधार पर मंझन ने अपना काव्य (मधुमालती) लिखा और दक्षिण के उर्दू कवि नसरती ने ‘गुलशाने इश्क’ नाम से यही प्रेमगाथा लिखी थी ।

हिन्दी की पहली आत्मकथा ‘अर्द्धकथानक‘ के आत्मकथाकार 17वीं सदी के जैन कवि बनारसीदास ने अर्द्धकथानक में लिखा है कि उन्हें मधुमालती और ‘मृगावती’ पढ़ने का ऐसा चस्का लगा था कि दुकान का सब काम-काज छोड़कर घर ही बैठे रहते थे- “अब घर में बैठे रहे नाहिनं हाट बाजार, मधुमालती मृगावती पोथी दोइ उचार ।”

बंगाल के कवि अलावल ने पद्मावत का अनुवाद बांग्ला में किया था।

पद्मावत की रचना 927 हिजरी अर्थात् 1521 ई. में प्रारम्भ हुई थी और जब कथा – समाप्ति पर आई तो उस समय शेरशाह का शासनकाल (1540-45 ई.) था ।

सूफी काव्य के अंतर्गत 37 कवियों द्वारा 55 काव्य प्राप्त हुए हैं।

जान कवि प्रथम हिन्दी कवि हैं जिन्होंने फारसी के लैला-मजनू आख्यान को लेकर ‘लै लै मंजनूं’ काव्य की रचना की है।

जान कवि की भाषा राजस्थानी प्रभावित ब्रजभाषा है ।

दामोदर कवि ने अपनी रचना ‘लखनसेन पद्मावती कथा’ को ‘वीर कथा’ कहा है।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ईश्वरदास कृत ‘सत्यवती कथा’ को भक्तिकाल के किसी धारा में स्थान नहीं दिया।

‘मृगावती’ के रचयिता कुतुबन चिश्ती वंश के शेखबुरहान के शिष्य थे और जौनपुर के बादशाह हुसैन शाह के आश्रित कवि थे ‘मृगावती’ में चन्द्रनगर के गणपति देव के राजकुमार और कंचनपुर की रानी रूपमुरारि की कन्या ‘मृगावती’ की प्रेमकथा का वर्णन है ।

मंझन कृत ‘मधुमालती‘ हिन्दी का प्रथम प्रेमाख्यानक काव्य है जिसमें बहुपत्नीवाद का सर्वथा अभाव है।

‘मधुमालती’ में नायक ‘मनोहर’ और महारस नगर की राजकुमारी ‘मधु मालती’ की प्रेम कथा के अनन्तर प्रेमा और ताराचंद की भी प्रेमकथा समानान्तर रूप से चलती है।

बनारसीदास ने अपनी आत्मकथा ‘अर्ध कथानक‘ में दो प्रेमाख्यानक – (1) मृगावती और (2) मधु मालती का उल्लेख किया है जो निम्नांकित है—
तब घर में बैठे रहें, नाहिंन हाट बाजार ।
मधुमालती, मृगावती पोथी दोय उचार ॥

सत्रहवीं शती के मध्य संख्या की दृष्टि से सर्वाधिक प्रेमाख्यानकों की रचना जान कवि ने की है जिनका रचना-काल 1612-1664 ई० माना जाता है।

जान कवि ने 78 ग्रन्थों की रचना की थी, जिसमें 29 प्रेमाख्यानक है। इनमें से प्रमुख हैं – (1) कथा रतनाबली, (2) कथा कनकावती, (3) कथा मोहिनी (4) कथा कंवलावती, (S) कथा नल दमयंती, (6) कथा कलावन्ती, (7) कथा रूपमंजरी, (8) कथा पिजरषां साहिजा दैवा देवलदे, (9) कथाकलन्दर, (10) ग्रन्थ लैलै मंजनू ।

सन् 1643 (सं० 1700) में दक्षिण के शायर नसरती ने ‘मधुमालती’ के आधार पर दक्खिनी उर्दू में ‘गुलशने इश्क’ के नाम से एक प्रेमकथा लिखी

जायसी कृत ‘पद्मावत’ में कुल 57 खण्ड है और इनका प्रिय अलंकार ‘उत्प्रेक्षा’ है।

मलिक मुहम्मद जायसी ने अपने पूर्व लिखे गये चार प्रेमाख्यानकों का उल्लेख किया है— (1) मधुमालती, (2) मृगावती, (3) मुग्धावती और (4) प्रेमावती।

जायसी प्रसिद्ध सूफी फकीर शेख मोहिदी (मुहीउद्दीन) के शिष्य थे और शेरशाह के समकालीन कवि थे तथा अमेठी के निकट जायस में रहते थे।

जायसी द्वारा रचित महत्वपूर्ण ग्रन्थ और उनके विषय में निम्न हैं

पद्मावत- नागमती, पद्मावती और रत्नसेन की प्रेम कहानी है
अखरावट– वर्णमाला के एक-एक अक्षर को लेकर सिद्धान्त सम्बन्धी तत्वों से भरी चौपाई है।
आखिरी कलाम- कयामत का वर्णन तथा मुगल बादशाह बाबर की प्रशंसा है।
कहरानामा- आध्यात्मिक विवाह का वर्णन है। यह कहरवा शैली में लिखी है।
मसलानामा- ईश्वर भक्ति के प्रति प्रेम निवेदन है।
चित्ररेखा- लघु प्रेमाख्यानक ।
कन्हावत

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने जायसी के द्वारा रचित तीन ग्रन्थों- (1) पद्मावत, (2) अखरावट तथा (3) आखिरी कलाम का ही उल्लेख किया है।

आचार्य शुक्ल के अनुसार ‘पद्मावत’ की कथा का पूर्वार्द्ध ‘कल्पित’ और उत्तरार्द्ध ‘ऐतिहासिक’ है

⇒ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है, “कबीर ने केवल भिन्न प्रतीत होती हुई परोक्ष सत्ता की एकता का आभास दिया था । प्रत्यक्ष जीवन की एकता का दृश्य सामने रखने की आवश्यकता बनी थी। यह जायसी द्वारा पूरी हुई।”

विजयदेव नारायण साही ने ‘पद्मावत’ को हिन्दी में अपने ढंग की अकेली ट्रेजिक कृति कहा है।

‘पद्मावत’ का ‘नागमती वियोग खण्ड ‘ हिन्दी साहित्य की अनुपम निधि है

सूफी कवि उसमान चिश्ती वंश परम्परा में ‘हाजीबाबा‘ के शिष्य थे और बादशाह जहाँगीर के समकालीन थे।

उसमान कृत ‘चित्रावली‘ में नेपाल के राजकुमार ‘सुजान’ और रूपनगर की राजकुमारी ‘चित्रावली’ की प्रेमकथा का वर्णन है।

चित्रावली‘ में अंग्रेजों के द्वीप का भी वर्णन किया गया है।

नूर मुहम्मद दिल्ली के बादशाह मुहम्मदशाह के समकालीन थे।

नूर मुहम्मद ने फारसी भाषा में ‘रौजतुल हकायक’ नामक ग्रन्थ की रचना की।

नूर मुहम्मद कृत ‘इंद्रावती’ में कालिंजर के राजकुमार राजकुँवर और आगमपुर की राजकुमारी इंद्रावती की प्रेम कहानी है।

आचार्य शुक्ल ने नूर मुहम्मद कृत ‘अनुराग बासुरी’ की निम्न विशेषताओं का उल्लेख किया है

(1) इसकी भाषा सूफी रचनाओं से बहुत अधिक संस्कृतगर्भित है ।
(2) हिन्दी भाषा के प्रति मुसलमानों का भाव ।
(3) शरीर, जीवात्मा और मनोवृत्तियों को लेकर पूरा अध्यवसित रूपक (एलेगरी) खड़ा करके कहानी बाँधी है।
(4) चौपाइयों के वीच-बीच में इन्होंने दोहे न लिखकर बरवै रखे हैं।

आचार्य शुक्ल ने नूर मुहम्मद कृत ‘इन्द्रावती’ को सूफी आख्यान काव्यों की अखण्डित परम्परा की समाप्ति माना है ।

कथानक रूढ़ि-  इसका अभिप्राय किसी ऐसी घटना या प्रसंग से है, जो एक बार प्रयुक्त होने के बाद परवर्ती प्रेमाख्यानों में बार-बार दोहरायी जाने के कारण रूढ़िगत हो गई। जैसे- चित्र-दर्शन, स्वप्न या शुक-सारिका द्वारा नायिका के रूप-सौंदर्य का वर्णन सुनकर नायिका पर आसक्त हो जाना, नायक का योगी होकर घर से निकल पड़ना इत्यादि ।

कडवक- सूफियों का काव्यरूप ‘कडवक’ था। 8 पद्धड़िया या अलिल्लह छंद के बाद जो धत्ता दिया जाता था, उसे अपभ्रंश में कडवक कहा जाता था। चौपाई और दोहे का सर्वप्रथम प्रयोग सरहपाद में फिर कबीर में मिलता है। आरम्भिक सूफी काव्य में पाँच-पाँच अर्द्धालियों के बाद दोहा रखने का नियम था, पर जायसी ने आठ-आठ अर्द्धालियों पर दोहा दिया है। आगे चलकर यह रूढ़ अवश्य हुई परन्तु इसका कोई निश्चित नियम नहीं था।

मसनबी- मसनबी का शाब्दिक अर्थ समानांतर (Parallel) है। मसनबी ग्रंथों में एक पंक्ति के समानान्तर दूसरी पंक्ति होने के कारण संभवतः इस रचना शैली का यह नाम दिया गया । मसनबियों में प्रथम अल्लाह फिर क्रमशः मुहम्मद साहेब, खलीफाओं, शाहेवक्त (तत्कालीन राजा) एवं गुरु की स्तुत होती है तथा ग्रंथ का विभाजन घटना – शीर्षकों के अनुसार होता है।

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