काव्य दोष की परिभाषा। भेद। उदाहरण

काव्य दोष की परिभाषा व लक्षण 

जिसके कारण काव्य के रसास्वादन में व्यवधान हो उसे काव्य दोष कहते हैं। जिस प्रकार काव्य गुण के कारण काव्य का उत्कर्ष होता है उसी प्रकार दोष के कारण काव्य का अपकर्ष होता है। दोषों के कारण काव्य का सौंदर्य कम हो जाता है और अर्थ को समझने में कठिनाई होती है काव्य दोष की सर्वप्रथम चर्चा आचार्य भरत ने की है

1- भरत के अनुसार काव्य दोष के लक्षण व परिभाषा

एते दोषास्तु विज्ञेया: सूरिभिर्नाटकाश्रय:।
एत एव विपर्ययस्त: गुणा: काव्येषु कीर्तिता।।
अर्थात दोषों के कारण काव्य की कीर्ति नाटकों में अच्छी नहीं होती है।

2- वामन के अनुसार काव्य दोष के लक्षण व परिभाषा

‘काव्य सौन्दर्याक्षेपहेतव: त्यागाय दोषा ज्ञातव्य’
अर्थात काव्य दोष वे तत्व है जो काव्य सौंदर्य की हानि करते हैं ।

‘गुण विपर्यात्मानो दोष:’
अर्थात गुण के विरोधी तत्व को दोष कहते हैं।

3- अग्नि पुराण के अनुसार दोष के लक्षण व परिभाषा

‘उद्वेगजनको दोषा:’
अर्थात काव्य में उद्वेग उत्पन्न करने वाले को दोष कहते हैं

4- मम्मट के अनुसार काव्य दोष की परिभाषा व लक्षण

‘मुख्यार्थ हति दोष:’

अर्थात जो मुख्य अर्थ का अपकर्ष करें वह दोष है

5- केशवदास के अनुसार दोष के लक्षण व परिभाषा

‘रंचक दोष न राजई कविता बनिता मित्त।
बूंदक हाला परत ज्यों गंगा घट अपवित्र ।।’
जिस प्रकार मदिरा की एक बूंद से गंगाजल अपवित्र हो जाता है उसी प्रकार रंच मात्र के दोष से काव्य का सौंदर्य नष्ट हो जाता है

‘प्रभु न कृतघ्वी सेइये दूषण सहित’

6- केशव मिश्र के अनुसार काव्य दोष के लक्षण व परिभाषा

‘दोषत्वं च रसोत्पत्ति प्रतिबन्धकत्वम’
अर्थात काव्य रचना के अंतर्गत रस उत्पत्ति के बाद तत्व को दोष देते हैं

7- श्रीपति मिश्र के अनुसार काव्य दोष की परिभाषा व लक्षण

जो पदार्थ के दोष ते आये कवित्त नसाइ।
दूषण तासो कहत है श्रीपति पंडित राय।।

नोट- आचार्य दंडी दोष को काव्य की विफलता कहते हैं जबकि भामह दोष को कुकवित्व कहते हैं। आनन्दवर्धन ने दोष की जगह अनौचित्य शब्द का प्रयोग किया है। चिन्तामणि ने कविकुलकल्पतरु के चौथे अध्याय में काव्य दोष का वर्णन किया है।

काव्य दोष के भेद

भरतमुनि ने दोषों की कुल संख्या दस मानी है।

1- गुढ़ार्थ 2- अर्थान्तर 3- अर्थहीन 4- भिन्नार्थ 5- एकार्थ 6- अनिप्लुतार्थ 7- न्यायोपेत 8- विषम 9- विसन्धि 10- शब्दच्युत

वामन ने दोषों को चार भागों में बांटा है

1- पदगत दोष 2- पदार्थगत 3- वाक्य दोष 4- वाक्यार्थ दोष

मम्मट ने दोष के पांच भेद बताए है।

1- वाक्य दोष 2- शब्द दोष 3- अर्थ दोष 4- रस दोष 5- छंद दोष

काव्य दोष के नाम व उदाहरण

श्रुति कटुत्व दोष- जो सुनने में कटु लगे वहाँ श्रुति कटुत्व दोष होता है। इस दोष के वाक्य में कर्ण कटु वर्ण, संयुक्त वर्ण की अधिकता होती है।

1- कंब की इक टक डारि रही, टटिया अंगुरिन टारि
2- शिद्धर्थ गए शिद्धार्थकुमार
3- कवि के कठिनतर कर्म की करते नहीं हम धृष्टता
पर क्या न विषयोत्कृष्टता करती विषयोत्कृष्टता

 

च्यंत संस्कृति दोष- जहां पर व्याकरण के नियमों का पालन न हो अर्थात लिंग, वचन आदि के आधार पर शब्दों का प्रयोग न हो वहां च्यूत संस्कृति दोष होता है।

1- मरम वचन सीता जब बोला
हरि प्रेरित लछिमन मन डोला
2- फूलों में लावण्यता देती आनन्द
3- क्षिपी स्तर में इक पावक रक्त कण-कण चूम
4- कौन तुम वसंत के दूत दिरस पतझड़ में अति सुकुमार
5- मधुप मस्त हो कुंज में गाते छवि के छंद

क्लिष्टत्व दोष- जहां पर काव्य में अर्थ की प्राप्ति में कठिनाई हो उसे क्लिष्टत्व दोष कहते हैं

1- तरु रिपु रिपुधर देखि के विरहिनि तिय अकुलाय
2- कुम्भज पान कुमारि सहोदर आनन देख लजात
3- अहि रिपु पति सदन है मुख तेरो रमणीक
4- वेद नखत ग्रह जोरि अरध करि, सोइ बनत अब खात
5- तो पर वारौ चार मृग, चार विहंग फल चार
6- खग पति पति तिय पितु वधू, जल समान तुव वैन

ग्रामत्व दोष की परिभाषा व उदाहरण- जहां पर काव्य आदि में ग्रामीण जनों की वाणीयों का प्रयोग हो अर्थात साहित्यिक भाषा में ग्रामीण अंचल के देशज शब्दों का प्रयोग हो वहां ग्रामत्व दोष होता है।

1- सत्य सराहि कछहुँ बरु देना
जानिहुँ माँगि लेहि चबैना
2- चीर जीवो जोरी जुरै, क्यों न सनेह गंभीर
को घटिए वृषभानुजा वे हलधर के वीर
3- मूढ़ पै पाग विराजति श्याम के, कानन कुंडल लोल निहारिये।
4- औंधाई सीसी सुलखि बिरह-बरनि बिललात
बिच ही सूखि गुलाब गौ, छीटो हुई न गात

न्यून पदत्व दोष- जहां पर अर्थ की प्राप्ति के लिए काव्य में शब्द को बाहर से जोड़ने की आवश्यकता पड़े वहां न्यून पदत्व दोष होता है।

1- नाना सरोवर खिले नव पंकजो के
ले अंक में बिहसते मन मोहते थे
2- न्नद ब्रज लीजै ठोकि बजाय
3- यदि मुझे बांधना चाहे मन, पहले लो बांध अनंत गगन
4- पानी, पावक, पवन, प्रभु ज्यों असाधु त्यों साधु

अधिकपदत्व दोष- जहां पर काव्य में छंद कि यति, गति में बाधक के रूप में अधिक शब्द आए उन्हें अधिक पदत्वदोष कहते हैं। या जहां काव्य में अनावश्यक शब्दों को प्रयोग किया गया हो उसे अधिक पदत्वदोष कहते हैं।

1- साक्षी है गिरि धवल हिमाचल।
गंगा यमुना का पावन जल
2- लिपटी पुहुप पराग पटसनी स्वेद मकरन्द।
3- मन मेरा स्फटिका कृति निर्मल रहे गुरूदेव

अश्लीलत्व दोष परिभाषा व उदाहरण- जहां पर जुगुप्सा भाव से युक्त श्रृगारिकता, कामुकता अमंगल सूचक शब्दों का प्रयोग किया जाय वहाँ अश्लीलत्व दोष होता है

आंखें निकाल उड़ जाते क्षण भर उड़कर आ जाते
शव चीभ खींचकर कौवे चुभला-चुभलाकर खाते

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